Karna Previous Birth – Nar Narayan Katha

सूतपुत्र, सूर्यपुत्र या राक्षसपुत्र – कर्ण के पूर्वजन्म कि कहाणी

Karna Previous Birth Story – Nar Narayana Katha | महापराक्रमी कर्ण के बारे में, सभी लोग जानते हे और कर्ण के दुःख को जानकार वे काफी व्यथित भी होते हे. आज हम आपको दानवीर कर्ण की एक ऐसी कहानी सुनायेंगे जो शायद ही आपने कभी सुनी हो. त्रेता युग में कुछ कहानियों के तार कर्ण से आ कर जुड़ते हैं (Stories about Karna Previous Birth)

महारथी कर्ण और दम्बोद्भव

त्रेतायुग मे ये कहानी एक असुर से शुरू होती हे– जिसका नाम था दम्बोद्भव (Dambodhav). दम्बोद्भवने भगवान सूर्य के बडीही घोर तपस्या कि. सूर्यदेव प्रसन्न हो कर प्रकट हुए और दम्बोद्भव को वरदान मांगने को कहा. तो उसने “अमरत्व” का वरदान माँगा, भगवान सूर्य ने कहा कि अमरत्व का वरदान संभाव नाही हे और दुनिया मे कोई भी अमर नही हे, यहातक मेरा भी कभी न कभी अंत होगा. तब दम्बोद्भव सोच समझ कर माँगा कि “मुझे एक हज़ार दिव्य कवचों की सुरक्षा मिले, और इनमे से एक भी कवच सिर्फ वही तोड़ सके जिसने एक हज़ार वर्ष तपस्या की हो” और “जैसे ही कोई कवच को तोड़े,  उस व्यक्ति की तुरंत मृत्यु को प्राप्त हो जाये”.

Karna previous birth story

सूर्यदेवता बड़े चिंता में पड गए, क्यों की वे जानते थे कि यह असुर इस वरदान का दुरपयोग करेगा, पर उसकी तपस्या के आगे वे वर देने के लिए मजबूर थे और उन्हे उसे यह वरदान देना ही पडा. वरदान प्राप्त होने के बाद जैसा की हर असुर करता हे, दम्बोद्भव भी सहस्र कवचों के कारन अपने आप को अमर समझाने लगा और लोगो पर अत्याचार करने लगा.  दम्बोद्भव को दुनिया उसके हजार कवचो के कारन “सहस्र कवच” नाम से जानने लगी.

नर-नारायण और मूर्तिदेवी

उसी समय वर्तमान अफगानिस्तान में दक्ष प्रजापति नाम का एक रजा राज कर रहे था. दक्ष को एक पुत्री थी “मूर्ति”. राजा दक्ष अपनी पुत्रीका का विवाह भगवन ब्रह्मा के मानस पुत्र “धर्म” से किया. मूर्ति ने सहस्र्कवच और उसके अत्याचारों के बारे में सुना हुआ था और मन ही मन घबरायी हुयी थी.  इसीकारण उन्होंने श्री विष्णु से प्रार्थना की कि वे सहस्रकवच को ख़त्म करने के लिए वे पृथ्वी पर अवतार ले. भगवन विष्णु ने उसे आश्वासन दिया कि वे उसके पुत्र बनकर जन्म लेंगे और जल्द ही ऐसा करेंगे.

Nar narayana with mother karna previous birth

समय के चलते मूर्ति ने दो जुडवा पुत्रों को जन्म दिया जिनके नाम थे नर और नारायण. दोनों दो शरीरों में होते हुए भी एक थे. जैसे की दो शरीर एक आत्मा, भगवान विष्णु ने एक साथ दो शरीरों में जन्म लिया था.

दम्बोद्भव और नर-नारायण युद्ध

एक बार दम्बोध्भव उस वन पर आक्रमण कर देता हे जहा नर नारायण और मूर्तिदेवी रहते थे. दम्बोद्भव वन को तबाह कर ही रहा था की उसने एक तेजस्वी मनुष्य को अपनी ओर आते देखा. उसने अन्दर ही अन्दर एक अजीब से भय का अनुभव किया. अपने चेहरे पर नकली हास्य लाते हुए और भय होते भी दम्बोद्भव ने कहा “युवक तुम क्यों मृत्यु को गले लगाना चाहते हो? मेरा कवच सिर्फ वही तोड़ सकता है जिसने हज़ार वर्षों तक तप किया हो” नर ने हँस कर कहा कि “मैं और मेरा भाई नारायण में एक ही आत्मा वास करती हैं” वो मेरे बदले तप कर रहे हैं, और मैं उनके बदले युद्ध करूँगा.

युद्ध शुरू हुआ, शुरवात में तो नर कमजोर लग रहा था पर जैसे जैसे वक्त बीतता गया नारायण के तप से नर की शक्ति बढती चली जा रही थी. जैसे ही एक हज़ार वर्ष का समय पूर्ण हुआ, नर ने सहस्रकवच का एक कवच तोड़ दिया. लेकिन सूर्य के वरदान के अनुसार जैसे ही कवच टूटा नर मृत हो कर वहीँ गिर पड़ा. सहस्र कवच ने सोचा एक कवच गया पर संकट टल गया..!! नर तो मर गया, अब डरने की कोई बात नहीं हे. अब डरने को कोई बात नहीं.

Nar Narayana Fighting Dambodbhava

पर दम्बोद्भवका ये भ्रम कुछ क्षणोंमेही टूट गया. उसने देखा की नर उसकी और दौड़े आ रहा है. कुछ क्षण पहले ही तो इधर सामने ही नर की मृत्यु हुई थी और अभी ये जीवित होकर मेरी और कैसे दौड़ा आ रहा है ???  कुछ पलो में उसे सब समझ में आ गया जब उसने पास पड़ा नर का शव देखा और उसे नर की बात याद आ गयी. ये यक़ीनन नारायण था, नर का भाई जो हजार साल तप कर रहा था और वो उसकी और नहीं, बल्कि अपने भाई नर की और दौड़ के चला आ रहा था.

दम्बोद्भव ने अट्टहास करते हुए नारायण से कहा कि “तुम्हे अपने भाई को समझाना चाहिए था, इसने अपने प्राण व्यर्थ ही गँवा दिए” नारायण शांतिपूर्वक मुस्कुराए और उन्होंने नर के पास बैठ कर कोई मन्त्र पढ़ा और चमत्कारिक रूप से नर उठ बैठे. तब दम्बोद्भव की समझ में आया कि हज़ार वर्ष तक शिवजी की तपस्या करने से नारायण को मृत्युंजय मन्त्र की सिद्धि हुई है.  जिससे उन्होंने अपने भाई को पुनर्जीवित किया हे.

अब इस बार नारायण ने दम्बोद्भव को ललकारा और उसी वक्त नर तपस्या में बैठे. हज़ार साल के युद्ध और तपस्या के बाद फिर एक बार कवच टूटा और नारायण की मृत्यु हो गयी. फिर नर ने आकर नारायण को पुनर्जीवित कर दिया, और यह चक्र फिर फिर चलता रहा ।इस तरह ९९९ बार युद्ध हुआ. एक भाई युद्ध करता दूसरा तपस्या!!  हर बार पहले की मृत्यु पर दूसरा उसे पुनर्जीवित कर देता. जब 999 कवच टूट गए तो सहस्र्कवच समझ गया कि अब मेरी मृत्यु हो जायेगी और वो युद्ध त्याग कर सूर्यलोक भाग कर सूर्यदेव के शरण में गया.

शापित सूर्यदेव और कर्ण (Karna Previous Birth)

नर और नारायण उसका पीछा करते सूर्यलोक गये और सूर्यदेव को उसे सौंपने को कहा पर सूर्यदेव अपने भक्त को सौंपने पर राजी न हुए. तब नारायण ने अपने कमंडल से जल लेकर सूर्यदेव को श्राप दिया कि आप इस असुर को उसके कर्म के फल से बचाने का प्रयास कर रहे हैं,  जिस कारन आप भी इसके पापों में भागीदार हुए और आप को भी इसके साथ पृथ्वी पर जन्म लेकर फल भोगना होगा.(..Karna Previous Birth)

Karna previous birth story

समय बाद माता कुंती ने अपने वरदान को जांचते हुए सूर्यदेव का आवाहन किया, और कर्ण का जन्म हुआ. पर ये कहानी त्रेतायुग की होने के कारन यह बात आम तौर पर ज्ञात नहीं है,  कि  कर्ण सिर्फ सूर्यपुत्र ही नहीं है, बल्कि उसके भीतर सूर्यके साथ दम्बोद्भव दोनों का अंश हैं. जैसे नर और नारायण में दो शरीरों में एक आत्मा थी, इसके विपरीत कर्ण के एक शरीर में दो अंशो का वास है – सूर्य और सहस्रकवच के अंशो का. दूसरी ओर नर और नारायण महाभारत में  अर्जुन और कृष्ण के रूप में जन्म लेते हे।

कर्ण के भीतर जो सूर्य का अंश है, जो उसे तेजस्वी वीर बनाता है और सहस्रकवच के बछे उस अकेले कवच के साथ उसका जन्म होता हे (Because Of Karna Previous Birth) और उसके भीतर दम्बोद्भव का अंश होने से उसके कर्मफल से उसे अनेक अन्याय और अपमान मिलते है,  और उसे द्रौपदी का अपमान और ऐसे ही अनेक अपकर्म करने को प्रेरित करता है. महाभारत का युद्ध हजार सालो तक न चले इसी कारन इंद्र कर्ण से कवच लेते हे.

कर्ण के पूर्वजन्म की “रक्तजा और स्वेदजा” नामसे एक और कथा हमे मिली हे. अगले लेख में हम इस कथा को आपके सामने रखेंगे. आप को हमारी  आज कि कहानी (Karna Previous Birth) कैसी लगी कमेन्ट के जरिये बताये, like और subscribe करना न भूले

अन्य लेख- कर्ण और अर्जुन अंतिम युद्ध- कुरुक्षेत्र

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

nineteen − 18 =