Battle Of Eklavya And Lord Krishna

Eklavya And Lord Krishna Battle | एकलव्य कि मृत्यू कि कहाणी. शायद ही कोई व्यक्ती होगा जिसे एकलव्य कि कथा पडकर व्यथा न हुई हो. जब भी महाभारत पढ़ा जाता हे तो हम कर्ण और एकलव्य के बारे में पढ़कर जरुर ही व्यथित होते हे, क्या कर्ण और एकलव्य दोनों ही शायद द्वापरयुगीन भारतीय वर्णव्यवस्था के शिकार थे..?. या अधर्म की छोर से लडे गुमराह धर्मयोद्धा थे ??. अनेको लोगो के अनेको मत होंगे. आज हम आपको एकलव्य और भगवान कृष्ण के बीच लडे युद्ध के बारे मे बतायेंगे.

महाभारत कथा (Mahabharata Stories) ये हमारा महाभारत कि कथाओ को हिंदी के मध्यम से सब लोगो तक पुहचाने का प्रयास से.

सभी को एकलव्य की गुरुदक्षिना वाली कथा तो पता ही होगी. पर आज हम आपको एकलव्य की एक ऐसी कहानी बताएँगे, जो शायद ही कभी आपको किसीने बताई होगी. महाभारत काल मेँ प्रयाग के तटवर्ती प्रदेश मेँ एक राज्य था, श्रृंगवेरपुर राज्य. ये श्रृंगवेरपुर राज्य एकलव्य के पिता निषादराज हिरण्यधनु का था. निषाद एक समुदाय हे, और आज भी ये इस समुदाय के लोग बिहार और उत्तरप्रदेश में पाए जाते हे, और वे अपने आप को एकलव्य के वंशज बताते हे. श्रृंगवेरपुर के राजा हिरण्यधनु और उनके सेनापति गिरिबीर की वीरता के चर्चे पुरे भारतवर्ष में थे.

Eklavya and Lord Krishna Battle

श्रृंगवेरपुर राज्य एक छोटा राज्य था, पर यहाँ सम्पन्नता में कोई कमी नहीं थी. जनता सुख व सम्पन्नता से जि रही थी. ये राज्य एक गणपरिषद की तरह काम करता था. राजा सभी निर्णय अमात्य और मंत्रीपरिषद की सहायता से लेते थे. (प्रजातंत्र की स्थापना प्राचीन भारत में ही हुयी थी. सिकंदर के आक्रमण के वक्त उसका सामना कई गणराज्यो से हुवा था. और वो भारत के ज्यादा अन्दर आया भी नहीं था, सिर्फ चरणस्पर्श कर वापस लौटा था.) प्राचीन भारतीय गणराज्य ठीक उसी तरह काम करते थे, जैसे की आज के इंग्लैंड का प्रजातंत्र. जहा राजा एक विशिष्ट परिवार का होता था और मंत्रीपरिषद प्रजा से चुनी जाती थी.

अभिद्युम्न की कहानी (Child Eklavya Story)

जैसे जैसे वक्त बीतता गया राजा हिरण्यधनु को रानी सुलेखा द्वारा एक पुत्र प्राप्त हुआ जिसका नाम “अभिद्युम्न” रखा गया. शुरवात में माता-पिता उसे प्रेम से “अभय” नाम से बुलाते थे. जबी अभय पाँच वर्ष का था तब उसकी शिक्षा की व्यवस्था कुलीय गुरूकुल मेँ की गई. यही वह जागे थी जब अभिद्युम्न से अभय बने बालक का नामकरण एकलव्य हुवा.

कुछ लोग कहते हे की जातिप्रथा के चलते एकलव्य के साथ अन्याय हुवा था, पर महाभारत के कुछ पन्ने पलट के देखे तो पता चलता हे की भीष्म पितामह की सौतेली माता सरस्वती एक निषादकन्या थी, और पितामह भीष्म अपनी प्रतिज्ञा के चलते अपना वंश आगे नहीं बढ़ा पाए. इसी का मतलब पांडू और धृतराष्ट्र की दादी, कौरवो-पांडवो की परदादी एकलव्य की जाती से ही थी. एकलव्य की महान गुरुदाक्षिना की कहानी अगर आपको पढ़नी हे तो हमें कमेन्ट के जरिये बताईये.

Gurudakshina Eklavya

एकलव्य का राज्यरोहण(King Eklavya)

द्रोणाचार्य को अपने अंगूठे की गुरुदाक्षिना देने के बाद कुमार एकलव्य अपने गृहराज्य में पिता हिरण्यधनु के पास चला जाता हे. एकलव्य अपने अनन्य-साधनापूर्ण कौशल से अंगूठे के बिनाही धनुर्विद्या मेँ फिरसे प्रविन्य प्राप्त कर लेता है. कई साल बित जाते हे, राजा हिरन्यधनु की मृतु हो जाती हे. पिता की मृत्यु के बाद एकलव्य ही श्रृंगबेर राज्य का शासक बनता है, और अपने पिता की तरह एकलव्य भी अमात्य परिषद की सहायता से वो न केवल अपने राज्य का संचालन करता है, बल्कि निषाद भीलोँ की एक सशक्त सेना और साथही एक असाधारण नौसेना भी गठित करता है. एकलव्य के समय श्रृंगबेर राज्य की सीमाए अपने चारो तरफ विस्तार करती हे.

Nishad King Eklavya

एकलव्य, जरासंध और भगवान कृष्ण (Eklavya and Lord Krishna Battle)

कहानी का स्रोत -विष्णु पुराण और हरिवंश पुराण 

जरासंध भगवन कृष्ण के मामा कंस का ससुर था, और जब भगवान कृष्ण कंस का वध करते हे तो जरासंध तिलमिला उठता हे और यादवो के खिलाफ युद्ध शुरू कर देता हे. एकलव्य के निषाद वंश और जरासंध के मगध साम्राज्य के पूर्वापार घनिष्ट संबंध थे. और इन्ही के चलते एकलव्य भी जरासंध की सेना की तरफ से भगवन श्रीकृष्ण की मथुरा पर आक्रमण कर देता हे.एकलव्य, जरासंध के साथ मिलकर १७ बार मथुरा पर आक्रमण करता हे, एकलव्य की वीरता के सामने यादव सेना भी हतबल हो जाती हे और वो यादव सेना को लगभग ध्वस्त कर देता हे. एकबार जब युद्ध में यादव वंश में हाहाकर मचानेवाले और दाहिने हाथ में महज चार अंगुलियों के सहारे धनुष बाण चलाते हुए एकलव्य को भगवान् कृष्ण ने देखा तो उन्हें अपनी आँखों पर विश्वास ही नहीं हुआ था.

battle of Krishna and Eklavya

एकलव्य अकेले ही सैकड़ों  शुर यादव वंशी योद्धाओं को हराने में सक्षम था, पर १७ वे या एकलव्य के आखरी युद्ध में भगवन कृष्ण ने कृष्णनीति से एकलव्य का वध किया था. महावीर एकलव्य ने यादव सेना और मथुरा का इतना विनाश किया था, की यहाँ बसना मुश्किल हो गया था. साथ ही जरासंध का खतरा अब भी बाकि था इसीलिए यादवो को मथुरा छोड़ हजारो मिल दूर द्वारका शहर बसना पड़ा था.

कुरुक्षेत्र युद्ध और एकलव्य (Mahabharata War And Eklavya)

कुरुक्षेत्र युद्ध में निषाद राज्य ने कौरवो की तरफ से भाग लिया था तब इस युद्ध में एकलव्य का पुत्र केतुमान भी महाभारत युद्ध में भीम के हाथ से मारा गया था. महाभारत के युद्ध के बाद जब सभी पांडव अपनी-अपनी वीरता का बखान कर रहे थे तब भगवान कृष्ण ने अपने अर्जुन प्रेम की बात कबूली थी और कहा था

तुम्हारे प्रेम में मैंने क्या-क्या नहीं किया?? तुम संसार के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर कहलाओ इसके लिए मैंने आचार्य द्रोणाचार्य का वध करवाया, महापराक्रमी और सर्वोत्कृष्ट धनुर्धर कर्ण को कमजोर किया और न चाहते हुए भी एक और महान धनुर्धर एकलव्य को तुम्हारी जानकारी के बिना वीरगति दी ताकि तुम्हारे रास्ते में कोई बाधा ना आए

इतिहास ने एकलव्य को अनदेखा कर शायद उसके साथ अन्याय किया था. पर वर्तमान ने जानते- नजानते हुए एकलव्य का सम्मान किया हे, आज के युग मेँ आयोजित होने वाली सभी तीरंदाजी प्रतियोगिताओँ मेँ अंगूठे का प्रयोग नहीँ होता है, अत: अर्जुन की अंगूठे के उपयोग करनेवाली धनुर्विद्या काफी कम लोग(न के बराबर) जानते हे, पर एकलव्य की धनुर्विद्या आज भारत से दूर सातो समुद्रोपार भी विख्यात हे

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