Ashwatthama – Maharathi Of Mahabharata

अश्वथामा(Ashwatthama) – महाभारत का महान योद्ध

Ashwatthama – Maharathi Of Mahabharata | महाभारत के कुछ चुनिन्दा… सबसे बेहतरीन योद्धाओ मेसे एक, अगर क्रोधित हो तो दुनिया का कोई भी योद्धा उसे परास्त नहीं कर सकता था. न वो महलों में पला-बड़ा न ही वो किसी महान क्षत्रिय वंशसे ताल्लुख रखता था. जिंदगीभर धर्म की राह पर चला पर आखिर क्रोधके अधीन होकर कुछ ऐसा कर गया की… आजभी शापित जीवन जीता हे… mahabharatastories.in  में हम बात करेंगे द्रोनपुत्र अश्वथामा की.

अश्वथामा का बालपण (Childhood Of Ashwatthama)

अश्वथामा के जन्म के वक्त द्रोणाचार्य बहोत ही गरीबी और दरिद्रता में जीवन जी रहे थे. एकबार अश्वथामा अपने मित्रो के साथ खेलने गया तब उसका मित्र एक सफ़ेद रंग का पेय पी रहा था. जब उसने मित्र से पूछा की वो क्या और क्यों पी रहा था. तब मित्र ने कहा, “वो दूध था, और अच्छी सेहत और दिमाग के लिए उसकी माँ उसे रोज पिलाती हे.” अश्वथामा ये सुनकर घर गया और उसने अपनी माँ से दूध की मांग की, अत्यंत निर्धनता में रह रही उसकी माँ कृपी ने उसे समझाने की कोशिश की, पर अश्वथामा नहीं माना. तो माँ कृपी ने अश्वथामा को पानी में आटा मिलकर उसे दूध कहकर दिया और अश्वथामा ने उसे ख़ुशी ख़ुशी पिया.

Ashwatthama - Maharathi Of Mahabharata

अश्वथामा के बारे में (Mysteries Of Ashwatthama)

१. अश्वथामा स्वयं भगवान शिव का अंश था, वेदव्यास ने महाभारत के आदिपर्व में अश्वथामा को क्रोध, यम, काम और शिवांश का अंशावतार बताया था. शिव का अंश होने के कारन जब अश्वथामा को क्रोध आ जाता हे, तब उनके अन्दर का शिवांश सक्रीय हो जाता था. और वो युद्ध में भगवान् शिव की तरह विनाश का तांडव करता था. क्रोधित अश्वथामा का सामना करनेवाला योद्धा तीनो लोको में नहीं था. द्रोणाचार्य की हत्या के बाद अर्जुन ने कहा था की अश्वथामा अपनी क्रोध की अग्नि में हम पांचो पांडवो को भस्म कर सकता हे.

२. अश्वथामा के पास दिव्यास्त्रो का भण्डार था, जिसमे नारायणअस्त्र, ब्रम्हाशिर अस्त्र, और भी भयानक अस्त्र शामिल थे, महाभारत युद्ध के १५ वे दिन अश्वथामा ने अपने १ अग्निबाण से १ अक्षाहुनी पांडव सेना को नष्ट किया था.

३. १४ वे दिन को रात्रि को जब घटोत्कच कौरवो का भयानक संहार कर रहा था, तब अश्वथामा ने उसे पराजित कर भगा दिया था, इसी युद्ध के दौरान उसने घटोत्कच के पुत्र अंजनपर्व का भी वध कर दिया था और लगभग २ अक्षाहुनी राक्षसी सेना का संहार किया था… बाद में जब मध्यरात्री को जब घटोत्कच की शक्तिया बढ़ गयी तब घटोत्कच ने अश्वथामा को पराजित किया था.. तब वो द्रोणाचार्य के साथ वहा से भाग निकला था

४. जब अश्वथामा ने पांडवसेनापर नारायणअस्त्र का प्रयोग किया था, तब इस अस्त्र के सामने अर्जुन, भीम, युधिष्ठिर और सभी पांडव वीरो ने घुटने टेक दिए थे. ये कहना काफी उचित होगा की वो महाभारत का एकलौता ऐसा योद्धा था जिसने सिर्फ एक अस्त्र से पूरी की पूरी सेना को पराजित कर दिया था.

ashwatthama in war of mahabharata

५. महाभारत की १८ वि रात को, अश्वथामा ने महादेव की आराधना कर उनसे चद्रहास तलवार प्राप्त कर ली थी, उसी तलवार से अश्वथामा ने भयानक नरसंहार किया था. महादेव को प्रसन्न करने में अर्जुन को १२ साल लगे थे, पर अश्वथामा ने कुछ ही घंटो में भगवान् शिव को प्रसन्न कर लिया

६. महाभारत युद्ध से पहले जब पितामहा भीष्म ने युद्ध में शामिल होनेवाले सभी योद्धाओ का मूल्यांकन किया था. तब उन्होंने अश्वथामा के नाम पर आते हुए कहा था की “द्रोनपुत्र अश्वत्थामा अगर ताकद और प्रतिभा की बात करे तो महारथी हैं. अर्जुन और कर्ण जैसे धनुर्धारियों में श्रेष्ठ, और एक अलग युद्ध करने वाले और बलवान प्रहार करने वाले योद्धा हैं. जब वो अपनी प्रतिभा से  लाध रहे हो तो वो युद्ध क्षेत्र में तो साक्षात यमराज जैसे लगते हे.  परन्तु उनमें एक दोष है की उनको अपना जीवन अति प्रिय है. और इसी कारन  मृत्यु से डरने के कारण वे युद्ध से जी चुराते हैं.  इस कारण न तो उन्हें रथी मानता हूं और न अतिरथी.”

शापित अश्वथामा(Cursed Ashwatthama)

जब अश्वथामा ने एक रात्रि में उप-पांडवो(पांडवो) को चंद्रहास तलवार से मार डाला और वो बचे हुए एकमेव उप-पांडव जो की उत्तरा के गर्भ में था उसे मार कर पांडवो का सम्पूर्ण वंश नष्ट करना चाहता था. अश्वथामा ने तब ब्रह्मशिर अस्त्र का उपयोग उत्तरा के गर्भ पर किया. अर्जुन ने अपने पुत्र को बचाने के लिए ब्रह्मशिर अस्त्र का प्रयोग किया. सभी पांडव तब अश्वथामा को मरने वाले थे तब व्यास ने मध्यस्ती की पर कृष्णा ने अश्वथामा को नीच कर्म के लिए श्राप दिया की वो अगले हजारो सालो तक श्रापित जीवन जियेगा और साथ ही उसका मणि भी निकल लिया

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