The 3 Discipline: Paushya Parva [Hindi]

अदि पर्व की शुरवात एक उप-पर्वसे होती हे, इस पर्व का नाम के पौष्य पर्व. पौष्य पर्व में ऋषि धौम्य के ३ शिष्य अरुनि, उपलव्य और महर्षि वेद की कहानिया हे. महर्षि वेद के एक शिष्य उत्तंका की कहानी भी इस पर्व में आती हे.

महर्षि धौम्य और उनके शिष्य (Sage Dhaumya and Discipline)

प्राचीन काल की बात हे, तब ऋषी धौम्य नाम के महान साधू थे. धौम्य के तिन शिष्य थे उपमन्यु, अरुनि और वेद. तीनोही अनेको विद्याओ में निपुण थे. तीनो शिष्यों के साथ ऋषि धौम्य जंगल में रह रहे थे. उनका अभ्यास पूर्ण होने के उपरांत एकबार ऋषि उनकी परीक्षा लेने की सोची.

अरुनि की परीक्षा (Aruni and Dhaumya)

महर्षि धौम्य के आश्रम के पासमें एक छोटेसे झरने को एक बाँधसे रोका गया था. पर बाँध में एक गड्ढा पड़ा गया था. तब ऋषि धौम्य अपने शिष्य अरुनि को आज्ञा देते हे “किसी भी हालत में, इस पानी के बहाव को बंद करो”. अरुनि उस गड्ढे को बंद करने का मार्ग खोजता हे पर बहोत प्रयास करने के बाद भी उसे कोई उपाय नहीं मिलता. तब वो खुद उस गड्ढे में घुस जाता हे. उसके घुसने से गड्ढा भर जाता हे और पानी का बहाव रुक जाता हे. घंटो बिट जाते हे ऋषि को जब अरुनि कही दिखाई नहीं देता तो वे अपने दो शिष्योंको उसके बारे में पूछते हे. शिष्य उन्हें याद दिलाते हे की उन्होंने ही अरुनि को गड्ढे को बंद करने के लिए भेजा हे. धौम्य ऋषि अपने शिष्यों के साथ उसे ढूंढने लगते हे.

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“अरुनि..!! अरुनि ..!” ऋषि अपने शिष्य को उसके नामसे पुकारते हे. जैसे ही गुरु की पुकार अरुनि के कानोपर पड़ती हे वो गड्ढेसे निकल आता हे. जब ऋषि पूछते हे इतना वक्त क्यों लगा? और वो क्या कर रहा हे ? तब  वो बताता हे की वो गड्ढे में खुद बैठा हे. उसने ऐसा किया क्युकी और कोई मार्ग उसे नही मिला. अपने प्रति इतनी गुरुभक्ति को देख धौम्य खुश हो जाते हे और कहते हे “जिसतरह तुमने गड्ढे में घुसकर पानी के बहाव को रोका इसी कारण आजसे तुम्हारा नाम उद्धालक हे, और तुमने ये साबित कर दिया हे की तुम एक परिपूर्ण शिष्य बनचुके हो. तुमने अपनी शिक्षा पूर्ण की हे और अब तुम जहा भी जाओगे कीर्ति पाओगे”

उपमन्यु की कहानी (Upmanyu Story in Hindi)

धौम्य का एक दूसरा शिष्य भी था, उपमन्यु..!! उपमन्यु थोडासा मोटा था इस कारण ऋषि ने उसे गाय चराने का काम दिया. कुछ दिनों बाद ऋषिने देखा तो उपमन्यु वैसे का वैसा था. ऋषिने उससे पूछा “तुम अपनी क्षुधा को शांत कैसे करते हो?” उपमन्यु ने बताया की वो भिक्षासे मिले अन्न को खाकर जीता हे. धौम्य ने उसे आदेश दिया की आजसे तुम्हारी भिक्षा गुरुचरणों में अर्पित होगी.

कुछ दिन ऐसेही बित गए पर उपमन्यु का स्वास्थ्य जो के त्यों था. ऋषिने फिर एकबार उसे बुलाकर वही प्रश्न पूछा. उपमन्युने बताया की वो भिक्षा को अर्पण करने के बाद एकबार फिर भिक्षा मांगता हे. ऋषिने कहा “ये गलत बात हे, आजसे तुम्हे सिर्फ एकबार भिक्षा मांगने की अनुमति हे”.

ऐसेही अनेक दिन बित गए पर उपमन्यु के स्वास्थ में कोई फरक नहीं था. अब ऋषि चिंता में पड़ गए. उन्होंने एकबार फिर उपमन्यु को अपने पास बुलाया और पूछा “अब तुम किस तरहसे अपनी जीविनी जीते हो”. उपमन्यु ने कहा “में गाय का दूध पीकर अपनी जीविनी बीतता हु”. ऋषि ने उससे कहा की मुझसे पूछे बगैर गाय का दूध पीना गलत बात हे. और आगेसे तुम ऐसा नही करोगे.

पर फिर भी उपमन्यु की सेहत में कोई फर्क नहीं आया. अब ऋषि फिर एक बार उसे बुलाया और पूछा “अब तुम क्या खाते हो”. उपमन्यु ने कहा की गाय के बछड़े जब दूध पिते हे तो उनके मुहसे जो झाग निकलता हे में उससे अपनी जीवनी जीता हु. ऋषिने उसे अब ये करनेसे भी मन कर दिया.

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अब जंगले में उपमन्यु जब गया तब वे भूक के मारे तडपने लगा. उसे कोई ऊपर नही सूझ रहा था जिससे वो अपनी क्षुधा को शांत कर सके. उसने इस स्थितिमें अर्का वृक्षने पन्ने खा लिए. इस वृक्षके पन्नो के कारण उसकी दृष्टी चली गई. अँधा उपमन्यु जंगल में भटक गया और एक कुए में जा गिरा. रात होगई पर अबभी उपमन्यु वापस नहीं लौटा इस कारन ऋषि और शिष्य उसे ढूंढने निकले. जब उन्होंने कुए के पास जाकर देखा तब वहा उपमन्यु मिला. उपमन्युने उन्हें सब बात बता दी. तब गुरु धौम्यने कहा की तुम अश्विनी कुमारो की प्रार्थना करो.

उपमन्यु ने अश्विनी कुमारो की प्रार्थना की, अश्विनी कुमार प्रसन्न हुए और उसे एक पदार्थ देते हुए कहा की इस टुकड़े को खाओगे तो तुम्हारी दृष्टी वापस आ जाएगी. उपमन्युने कहा की वो गुरु के शब्दसे बंधा हे और वो इसे गुरु के चरणों पर अर्पण करना होगा. कुमार बोले तुम्हारे गुरु भी कई सालो पहले इस कुए में गिरे थे तब उन्होंने इसे खाया था. पर फिर भी उपमन्यु ने खानेसे मना कर दिया. अश्विनी कुमार उसकी गुरुभक्ति से बहोत खुश हुए. उन्होंने कहा की तुम्हारी दृष्टी वापस लौट आएगी और साथ ही तुम्हारे गुरु के दांत लोहे के हे पर तुमने जो महान गुरुभक्ति दिखाई हे इसकारण तुम्हारे दांत सोने के हो जायेंगे.

महर्षि वेद की कहानी (Sage Veda story in Hindi)

तीसरे शिष्य वेदा, जिन्हें गुरुने आदेश दिया की तुम आश्रममेही रहकर सेवा करोगे. वेदाने आश्रममें रहकर अनेको दिनों तक गुरु की महान सेवा की. गुरु धौम्य इस सेवासे प्रसन्न हुये और उन्होने वेदोका ज्ञान देकर ऋषि वेदा को घर जाने की अनुमती दी. महर्षी वेदा ने अपने घर जाकर अत्यंतही साधारणसा जीवन व्यतीत किया. उनके तिन शिष्य हुए उनमे से एक थे उत्तंका.

उत्तंका की कहानी (Uttanka Story In Hindi)

महर्षि वेद का एक बेहतरीन शिष्य था उत्तंका. जब उत्तंकाने अपनी शिक्षा पूर्ण की तब उन्होंने गुरुसे गुरुदाक्षिना मांगने के लिए अनुरोध किया. महर्षि वेद ने गुरुदाक्षिना लेनेसे इंकार कर दिया पर उत्तंका ने आग्रह करने के बाद उन्होंने कहा “अपनी गुरुमाता को जो चाहिए वो दो”.

उत्तंका गुरु का आदेश पाकर गुरुमातासे मिला. उन्होंने गुरुमाता को दक्षिणा मांगने के लिए कहा तब गुरुमाताने कहा “मुझे पौष्य राजा की रानी की बलिया चाहिए, में उन्हें आश्रम के समारोह में पहनूंगी जो की आजसे चार दिन बाद हे”

गुरुमातासे आदेश लेकर उत्तंका पौष्य राज की तरफ निकल पड़ा. रास्ते में उसे एक महकाय बैल और उसपर बैठा एक महाकाय इन्सान मिला. उस इन्सान ने उत्तंका को बैल का मलमूत्र खाने के लिए कहा. उत्तंकाने पहले तो मना कर दिया पर उस महाकाय इन्सान के बार बार अनुरोध करने के कारन उन्होंने बैल का मल काय और मूत्र पिया.

Uttanka Story

उत्तंका अब पौष्य राजा के महल में पुहंचे. उन्होंने राजा को गुरु के आदेश के बारे में बताया. पौष्य राजाने कहा की तुम अंतर-गृह में जाकर महारानी से बलिया ले जाओ. जब उत्तंका अंतर-गृह में गया तो उसे महारानी दिखी ही नही. उत्तंका बहार आकर राजा को दोष देने लगा, तब महाराजा पौष ने कहा “शायद आप शुद्ध नही हे, इसीकारण आपको महारानी के दर्शन नही हुए”. तब उत्तंकाने अपने आप की जलसे शुद्धी करवाई, और जब वे अन्दर गए तो उन्हें महारानी दिखाई दी.

महारानी ने बड़ेही आनंदसे अपनी बलिया उत्तंका को देदी. साथ ही महारानी ने उत्तंका को नागो के राजा तक्षक के बारे में चेतावनी दी, जो हमेशासे ही इन बालियों को पाना चाहता था.

उत्तंका जब वापसी के रस्ते में था, तब तक्षक एक भिकारी के रूपमें उसके पास पुहचा और उसने बालियों को चुरा लिया. तक्षक सीधा पाताललोक में पुहचा. उत्तंका भी उसके पीछे पाताल लोक में पुहचा. हजारो प्रयास करने के बाद भी तक्षक ने उत्तंका को बलिया वापस नहीं लौटाइ.

तब उत्तंका आगे गया, उसे वहा एक दो औरते बुनाई करती हुई दिखी. एक के हाथ में काला धागा था तो दूसरी के हाथ में सफ़ेद. वहा एक चक्र भी था जिसके बारा आरे थे और ६ इन्सान उस चक्र को घुमा रहे थे. साथ ही एक घोडा और इन्सान भी थे. उत्तंका ने इन्सान की प्रार्थना की और उसे तक्षक की करतूत के बारे में कहा. इन्सानने तब घोड़े पर प्रहार किया जिस कारन घोड़े के मुहसे ज्वाला निकालने लगी… सारी ज्वाला नागलोक को ख़त्म करने के लिए थी. इस बातसे तक्षक घबराया और बलिया लेकर उत्तंका के सामने खड़ा हुवा.

बालियों को लेकर उत्तंका ठीक चौथे दिन गुरुमाता के पास पुहचे. उन्होंने बलिया गुरुमाता को दी और जो कुछ भी हुवा वो बताया. उसने कहा की “माता जो कुछ भी हुवा उसका अर्थ मुझे समझ नही आया”. तब गुरुमाताने कहा “रास्ते में जो बैल तुम्हे मिला था, वो ऐरावत था और वो महाकाय व्यक्ती देवराज इंद्र थे. तुमने जो मल खाया वो अमृत था जिसके कारन तुम जिन्दा पाताललोक में गए. पाताल लोक में जो दो औरते तुमही मिली वो धता और विधाता थी जो दिन और रात्री को बन रही थी. चक्र के आरे साल के महीने थे तो ६ आदमी ६ ऋतूको संबोधित करते थे. जिस घोड़े के मुहसे आग निकली वो अग्निदेव थे तो वो इन्सान वरुणदेव थे”. महर्षि वेदने उसे बताया की इंद्र जो उनके मित्र हे उन्होंने उसकी मदत की हे.

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