Adi Parva – Mahabharata (Hindi)| आदि पर्व – महाभारत

महाभारत कि शुरवात आदि पर्वसे होती हे | नाम से ही हम ये जान सकते हे कि आदी पर्व यांनी महाभारत का प्रथम पर्व | हम आदी पर्व को महाभारत कि प्रस्तावन या उनके सभी पर्वो का संक्षिप्त संग्रह भी कह सकते हे | च्यवन का जन्म, पुलोमा दानव का भस्म होना, जनमेजय के सर्पसत्र की सूचना, नागों का वंश, कद्रू कद्रू और विनता कहानी, समुद्र मंथन, परीक्षित की कहानी और सर्पसत्र, उपरिचर का वृत्तान्त, व्यास इत्यादि की उत्पत्ति, दुष्यन्त और शकुन्तला की कहानी, पुरूरवा, नहुष ययाति इन सभी के चरित्र, पितामहा  भीष्म का जन्म और साथ ही कौरवों-पाण्डवों की उत्पत्ति की कहानी, कर्ण-द्रोण आदि के बारे में, द्रुपद की कहानी, लाक्षागृह की कहानी, हिडिम्ब वध और हिडिम्बा भीम विवाह, बकासुर की कहानी और  वध, धृष्टद्युम्न और द्रौपदी के जन्म की कहानी, द्रौपदी-स्वयंवर और विवाह, पाण्डव का हस्तिनापुर में पुनरागमन, सुन्द-उपसुन्द कहानी, अर्जुन का वनवास, सुभद्राहरण और विवाह, खाण्डव-वन दहन और मयासुर रक्षण की कथा बताई गयी है।

कुरु वंश-परिचय

शांतनु और भीष्म

विचित्रवीर्य और अंबिका को धृतराष्ट्र तो विचित्रवीर्य और अंबालिका को पांडु नामके पुत्र पैदा हुए। बड़े पुत्र धृतराष्ट के अंधे होने के कारन विचित्रवीर्य की मृत्यु के बाद पांडु को राजा बनाया गया था। अंबिका की दासीपुत्र विदुर का लालन-पालन भी हस्तिनापुरमें राजकुमारों की तरह किया गया।

प्राचीन भारत में ययाति नमक एक प्रतापी राजा अपनी खांडवप्रस्थ नाम की राजधानी से राज किया करते थे | जिस जगह खांडवप्रस्थ था उसी स्थानपर महाभारत में इन्द्रप्रस्थ बसाया गया |

राज ययाति की दो रानिया थी,

  • गुरु शुक्राचार्य की बेटी देवयानी
  • और असुरराज वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा

ययाति को देवयानी से दो पुत्र हुए जिनके नाम थे यदु और तुर्वसु। इन्हीमेसे यदु के वंशजो को आगे जाकर यदुवंशी कहा जाने लगा, भगवान श्रीकृष्ण और बलराम इसी यदुवंश में पैदा हुए थे। तो शर्मिष्ठा को ययातिसे तीन पुत्र हुए, इन तीनो मेसे सबसे छोटा था पुरु, जो बहुत ही पराक्रमी था साथ ही वो महान पितृभक्त था। ययाति ने पुरु को ही राज्य का नया शासक बनाया । इसी पुरु के नाम से आगे पुरु वंश की शुरवात हुयी थी। पुरुवंश में आगे जाकर दुष्यंत नाम के राजा हुए जिन्होंने शकुंतला से विवाह किया, शकुंतला से उन्हें भरत नामका एक महाप्रतापी पुत्र प्राप्त हुवा और इसी भरत के नाम पर ही महान जम्बुद्वीप का नाम भारत पड़ा। पूरु वंश को आगे जाकर भरतवंश कहा जाने लगा | इसी वंश में ‘हस्तिन’ नाम के एक राजा हुए जिन्होंने हस्तिनापुर का निर्माण किया और वही अपनी नई राजधानी बसाई। हस्तिन के वंशजो में कुरु नामक एक राजा हुए उनके वंशज कौरव कहलाए और इन्ही राजा कुरु के नाम से ही कुरुक्षेत्र प्रसिद्ध हुआ।

शांतनु

कुरु वंश में शांतनु नाम का एक महाप्रतापी राजा हुवा था | राजा शांतनु का प्रथम विवाह गंगासे विवाह हुवा था | एक बार अष्ट-वासु नामक आध देवताओसे तंग आकर वशिष्ट ऋषिने माता गंगा का श्राप दिया था की उन्हें मनुष्य योनी में जन्म लेना पड़ेगा | जब अष्ट-वसुओ ने ऋषि की प्रार्थना करी तो उन्होंने उनसे कहा की “सात वसुओ का तो जन्म लेते ही उद्धार हो जायेगा, पर सबसे ज्यादा कष्ट देनेवाले उत्पाती वसु यानी वसु प्रभास को मृत्यु-लोक में बहुत दिनतक रहना पड़ेगा | शांतनु और गंगा को आठ पुत्र हुए | पर सात बेटो को गंगा ने अपनी ही धारामें बहाकर मुक्त कर दिया, पर अंतिम और आठवे पुत्र को शांतनु ने बहाने नही दिया | तब गंगाने शांतनु को त्याग दिया, और अपने पुत्रसहित स्वर्गलोग चली गयी, इस पुत्र का नाम था देवव्रत | ये देवव्रतअपनी एक भीष्म प्रतिज्ञा के कारन आगे चलकर पितामहा भीष्म कहलाये | एक दिन गंगातट पर विहार कर रहे शांतनुने एक बालक को अपने तिरोसे गंगाके प्रवाह को रोक-कर रखते हुए देखा | तब वहा गंगा प्रकट हुयी और उसने शांतनु को बताया की, जिस बालक की धनुर्विद्या से वो चकित हुवा हे वो उसीका पुत्र हे | शांतनु ने अपने इस पुत्र को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया |

King shantanu and ganga

भीष्म प्रतिज्ञा

महाराज शांतनु एक बार यमुना विहार कर रहे थे | तभी उन्होंने एक सुन्दर कन्या को देखा, उस सुन्धर धीवर कन्या का नाम था सत्यवती | सत्यवती को देखते हे शांतनु उसके प्रेममें पड़ गए, और उन्होंने सत्यवती के पिता से सत्यवतीसे विवाह करने की कामना जाहिर कर दी | सत्यवती के पिता इस विवाह के लिए तैयार ही गये, पर उन्होंने एक शर्त रखी | शर्त थी, सत्यवती के होनेवाले बेटो के लिए सिंहासन की | शर्त सुनकर राजा सोच में पड़ गए, और वे दुखी रहने लगे… राज्य का उत्तराधिकारी तो पहले ही तय हो चूका था… देवव्रत !! पिता के दुःख को भीष्म सह नहीं सके | वे धीवर के पास गए और उन्होंने उसे बताया की, सत्यवती के पुत्र ही हस्तिनापुर के वारिस होंगे | धीवर भी चालक था, उसने कहा की “राजपुत्र, मुझे आप-पर पूर्ण भरोसा हे, पर यदि आपके पुत्र सिंहासन पर दावा करेंगे तो ??” | इस पर देवव्रत ने कहा “में आजन्म ब्रह्मचारी रहूँगा, तथा आपकी कन्या के पुत्र और उनके वंशजही राज्यके उत्तराधिकारी होंगे” | इस भीषन प्रतिज्ञा के कारन देवव्रत को बादमे भीष्म नामसे जाना जाने लगा |

इस तरह से शांतनु का विवाह सत्यवती से हो गया और उन्हें दो पुत्र हुए-

  1. चित्रांगद
  2. विचित्रवीर्य

शांतनु के बाद चित्रांगद ही सिंहासन पर बैठे और चित्रांगद की मृत्यु के बाद विचित्रवीर्य गद्दी पर बैठे।

धृतराष्ट्र और पांडु

विचित्रवीर्य के विवाह का समय आने पर, काशी नरेशने अपनी तीन कन्याओं अंबा, अंबिका और अंबालिका के स्वयंवर का आयोजन किया था| हस्तिनापुर को भी इसका निमंत्रण मिला। पितामहा भीष्म विचित्रवीर्य को लेकर काशी-स्वयंवर में गए और काशी की राजकन्याओं जीतकर बलपूर्वक रथ में बीठाकर ले आए। जब वे काशी से हस्तिनापुर आ रहे थे तब अंबा ने भीष्म से कहा की उसने मनही मन शाल्वराज पति मान लिया हे और वे उसके प्रेम के पड़ चुकी हे,  तब भीष्मने अम्बा को मुक्त कर दिया और अंबिका- अंबालिका का हस्तिनापुर में विचित्रवीर्य से विवाह हो गया।

Blind King Dhritrashtra

उधर अंबा जब शाल्वराज के पास पहुँची, तो शाल्वराज ने उसका ये कहकर स्वीकार नहीं किया, की उसे भीष्म उठाकर ले गये थे। प्रताड़ित अंबा ने अपनी इस हालत के लिए भीष्म को जिम्मेवार माना और मनही मन भीष्म से बदला लेने की ठान ली| अपनी कठोर साधनासे उसने ये वर प्राप्त किया, की भीष्म का वध अगले जन्म में उसी के कारन होगा। अम्बा ने वर प्रकार अपने प्राण त्यागे और अगले जन्म में यही अंबा शिखंडी के रूप में जन्मी और भीष्म की मृत्यु का कारण भी बनी।

विचित्रवीर्य बिना पुत्र के ही मृत्यु को प्राप्त हुवा तब सत्यवती की मध्यस्तता से वेद-व्यास से अंबिका को धृतराष्ट्र तथा अंबालिका को पांडु नामक पुत्र पैदा हुए, साथ ही एक दासी को विदुर नाम का पुत्र पैदा हुवा। विचित्रवीर्य की मृत्यु के बाद बड़े पुत्र धृतराष्ट के अँध होने के कारन पांडु को राजगद्दी पर बिठाया गया। वेदव्यास से हुए दासी के पुत्र विदुर का लालन-पालन भी हस्तिनापुरमें राजकुमारों की तरह किया था।

धृतराष्ट्र का विवाह गंधार की राजकुमारी गांधारी से हुआ था। गांधारी एक महान पतिव्रता थी और वो अपने पति के अंधा होने के कारण खुद भी अपनी आँखों पर पट्टी बाँधे रहती थी। धृतराष्ट्र और गांधारी को सौ पुत्र और एक पुत्री हुई। सभी पुत्रों में सबसे बड़ा था दुर्योधन !! और बेटी का नाम था दुःशला | दुःशला जिसका विवाह सिन्धु नरेश जयद्रथ से हुआ था। धृतराष्ट्र को एक दासी से एक पुत्र हुवा था जिसका नाम था युयुत्सु।

विद्यार्जन में पांडव कौरवों से हमेशा दो कदम आगे थे। एक दिन वे खेल रहे थे, उनकी गेंद एक कुएँ में गिर गई। युधिष्ठिर ने कुएँ अन्दर झाँका तभी उनकी अँगूठी भी कुएँ में गिर गई। सभी चिंता में कुवे के बहार बैठे थे तभी एक तेजस्वी ब्राह्मण वहा आया | ब्राह्मण ने सभीसे चिंता का कारन पूछा और चिंता का कारन जानकर उसने एक मन्त्र पढ़कर तीर कुए में मार दिए और उनसे गेंद को बहार निकाला | युदिष्ठिर ने उनसे अंगूठी भी निकालने की प्रार्थना की | तब ब्राह्मणने एक बाण चलाकर तीर की नोकमें फसाकर अंगूठी को बहार निकला | ये महान तीरंदाज कोई और नहीं था, वे थे आचार्य द्रोण |

पांडू का विवाह शूरसेन की कन्या पृथा, जिसे कुंती के नामसे भी जाना जाता हे | कुंती रिश्ते में भगवान कृष्ण की बुवा लगती थी | विवाहसे पहले कुंती की सेवा से प्रसन्न होकर दुर्वासा ऋषिने उसे ऐसे मन्त्र सिखाये थे, जिन की मदत से वो किसी भी देवता का आवाहन कर सकती थी | कुमारी कुंती ने जिज्ञासाके चलते भगवान सूर्य का आवाहन किया और उनसे उन्हें एक पुत्र की प्राप्ति हुयी | लोकलाज के कारन उन्होंने इस पुत्र को गंगा में बहा दिया | एक दिन सुबह सूत अधिरथको ये पुत्र गंगा के जलसे मिला और उसने उसका पालन किया | इस बालक की तेजस्वी बालियोंके कारन इसे कर्ण नाम मिला |

कुंती से पांडु के तीन पुत्र हुए –

  1. युधिष्ठिर
  2. भीम
  3. अर्जुन

पांडू का एक और विवाह मद्रदेश की राजकुमारी माद्रीसे हुवा था | पांडू और माद्री को दो पुत्र हुए

  1. नकुल
  2. सहदेव

धृतराष्ट्र के पुत्र कौरव कहलाये तो पांडू के पुत्र पांडव | एक दिन वन में माद्रीसमेत विहार करते समय पांडू की मृत्यु हो गयी | रानी माद्री पंडू समेत उनकी चिताके साथ चली गई | राजमाता कुंतीने पांचो पुत्रो का पालन-पोषण किया |

Pandava Lineage

कौरव-पांडव

कौरवो और पांडवो की शिक्षा कृपाचार्य की देख-रेख में होने लगी थी | दुर्योधन पांडवोसे इर्षा रखता था और विशेष रूप से भीम को अपना प्रतिद्वंदी समझता था | भीम भी कौरवो को सताता था | एक बार दुर्योधन के भीम को मारने की योजना बनायीं और जलक्रीडा के बहाने भीम को गंगा किनारे ले गया | भोजन में विष मिलाकर उसे अचेत कर दिया और फिर बांधकर गंगा में फेंक दिया | भीम के घर न पुहंचाने पर सभी को चिंता हो गयी | उधर गंगामें बहते वक्त भीम के शरीर का विष गंगा के विषैले सांपोने चूस लिया और वे जल से बाहर आ गया | भीम को जीवित पाकर कुंती और पांडवो को हर्ष हुवा |

कौरवो पांडवो की शिक्षा

विद्यार्जन में पांडव कौरवों से हमेशा दो कदम आगे थे। एक दिन वे खेल रहे थे, उनकी गेंद एक कुएँ में गिर गई। युधिष्ठिर ने कुएँ अन्दर झाँका तभी उनकी अँगूठी भी कुएँ में गिर गई। सभी चिंता में कुवे के बहार बैठे थे तभी एक तेजस्वी ब्राह्मण वहा आया | ब्राह्मण ने सभीसे चिंता का कारन पूछा और चिंता का कारन जानकर उसने एक मन्त्र पढ़कर तीर कुए में मार दिए और उनसे गेंद को बहार निकाला | युदिष्ठिर ने उनसे अंगूठी भी निकालने की प्रार्थना की | तब ब्राह्मणने एक बाण चलाकर तीर की नोकमें फसाकर अंगूठी को बहार निकला | ये महान तीरंदाज कोई और नहीं था, वे थे आचार्य द्रोण, कृपाचार्य के जीजा | उनका विवाह कृपाचार्य की बहिन कृपी से हुवा था और उन्हें उनसे एक पुत्र भी था … अश्वथामा | पांचालनरेश द्रुपद उनका सहपाठी था और वे दोनों गहरे मित्र थे | कभी द्रुपदने बचपने में उनसे वादा किया था, की राजा बनने पर वे द्रोण को अपना आधा राज्य डे देंगे | जवानी में जब द्रोण उनसे वादा याद दिलाने गए तो उन्होंने इससे इनकार कर दिया | तभीसे द्रोण के मनमें द्रुपदसे बदला लेने की बात थी | द्रोणाचार्य की विद्यासे प्रभावित होकर भीष्मने द्रोणाचार्य को राजकुमारों के लिए रख लिया | अर्जुन द्रोणाचार्य को अबसे अधिक प्रिय थे |

Karna Vs Arjuna Hastinapur

चिड़िया और लक्ष भेद

एक दिन द्रोणाचार्य ने अपने सभी शिष्यों की परीक्षा लेने की ठान ली | उन्होंने एक पेड़पर ऊँची डालीपर एक लकड़ी की चिड़िया टांग दी, और कहा की तुम्हे चिड़िया की आंख को भेदना हे | पहले युदिष्ठिर की बारी आई उससे पूछा गया तुम क्या देख रहे हो, उसने कहा में पेड़ की डाल पर बैठी चिड़िया को देख रहा हु | सभी राजकुमारों ने लगभग एकजेसे उत्तर दिए पर अजुन ने कहा की उसे सिर्फ चिड़िया की आँख दिख रही हे | और अर्जुन ने तीर चलाया और चिड़िया की आंख को भेद दिया |

एकलव्य की कहानी

एक दिन एक निषाद बालक द्रोन के पास विद्यार्जन के लिए आया | द्रोणने उन्हें बताया की वे केवल राजकुमारों को शिक्षा देते हे | और वे एक निषाद को शिक्षा नहीं देंगे | बालक ने वनमें द्रोण की मूर्ति बनायीं और अपनी लगन से एक महान धनुर्विद्या अर्जित की | एक दिन हस्तिनापुर के सभी राजकुमार जंगल में खेल रहे थे, तभी उनका कुत्ता बड़ा ही शोर मचा रहा था | पर अचानक कुत्ते का भोंकना बंद हो गया | जब सबसे वहा जाकर देखा तो, कुत्ते हे मुह में कुछ तीर इस तरह घुसे थे की उसे खरोच भी नहीं आई थी और वो भौंक भी नही पा रहा था | ये धनुर्धर तो अर्जुन सेभी हजार गुना बेहतर था | किस महान धनुर्धर ने ये सब किया ये सब देखने लगे | राजकुमारों ने जब एकलव्य को देखा तो उन्होंने स्वाभाविक रूपसे आचार्य का नाम पूछा तो एकलव्य ने द्रोण की मूर्तिकी तरफ इशारा किया | हस्तिनापुर पुहाचे तब सभी राजकुमारों ने गुरु को इस बारे में बताया | अर्जुन अपने गुरुसे गुस्सा हुए थे, क्योकि द्रोणाचार्य अर्जुनसे कहा था की वो विश्व का सबसे महान धनुर्धर हे | अर्जुनने द्रोणाचार्य से कहा की वो झूटे हे | तिलमिलाए हुए द्रोणाचार्य वनमें पुहचे और अपनी न सिखाई हुयी विद्या की दक्षिणा में एकलव्यसे उसका अंगूठा मांग ले आये |

हस्तिनापुर में विद्या प्रदर्शन

पितामहा भीष्म के कहने पर गुरु द्रोणने राजकुमारों का शस्त्र संचालन का आयोजन किया | सम्पूर्ण हस्तिनापुर की प्रजा अपने प्रिय राजकुमारों की निपुणता देखने के लिए आई | भीष्म, कुंती, धृतराष्ट, गांधारी, विदुर और हस्तिनापुर के सभी श्रेष्ठजन उपस्थित थे | सभी राजकुमारों ने श्रेष्ठ विद्या का प्रदर्शन किया | भीम और दुर्योधन दोनों ने असाधारण गदायुद्ध दिखाया, दोनों एक दुसरे के बराबर योद्धा थे पर अंत में दुर्योधन के इर्शायुक्त ताकदवर वार देखते हुए गुरु द्रोण ने युद्ध विराम का संकेत दिया | दोनों तब भी भिड़े रहे तो, अश्वथामाने मध्यस्ती करी और दोनों को अलग कर दिया |

कर्ण और अर्जुन

अर्जुन मैदान में आया और अपनी लुभावनी धनुर्विद्या का प्रदर्शन कर सबको हैरान का दिया | तभी एक योद्धा दर्शको मेसे मैदान में आया और उसने अपने अमोघ बानो से वो कर दिखाया जो करने में अर्जुन को अच्छीखासी मेहनत करनी पड़ी थी, साथ ही उसने नम्रता से विनती की, की वो भी अपनी धनुर्विद्या का प्रदर्शन करना चाहता हे और जो भी अर्जुन ने किया वो मेरे लिए भी एक साधारण कार्य हे, साथ ही उसने अर्जुन से द्वन्द करने की भी इच्छा जाहिर की | वो कर्ण था !! महारथी कर्ण | पर कृपाचार्यने उसे सूतपुत्र कहकर उसकी बात कांट दी, और कहा ये मैदान राजकुमारों का शौर्य देखने के लिए बना हे. किसी सूतपुत्र का नहीं | तब दुर्योधनने कर्ण को अंग देश का राजा घोषित कर दिया और वही उसका राजतिलक कर दिया | अर्जुन ने कर्ण से तब कहा, कर्ण ! तुम वीर हो, पर तुम ये मत समझो की वीरता का वरदान सिर्फ तुम्हे मिला हे | संध्या हो चली थी, इसीलिए पितामहा भीष्मने प्रदर्शन बंद करने का आदेश दिया | अर्जुन को द्वन्द में पराजित करना कर्ण की ख्वाइश बनकर रह गयी |

राजा द्रुपद से द्रोण का प्रतिशोध

शिक्षा का अंतिम दिन आ ही जाता हे | उस दिन द्रोणाचार्य सभी राजकुमारोंसे अपनी गुरुदाक्षिना माँगते हे | और इसके रुपमे राजकुमारों को राजा द्रुपद को बंदी बनाकर लाने का आदेश देते हे | कौरव-पांडव पंचाल पर आक्रमण कर देते हे और द्रुपद को बंदी बनाकर द्रोण के समक्ष लाते हे (टिप- कौरवो का द्रुपद द्वारा पराजय और फिर पांडवो द्वारा द्रुपद को बंदी बनाना असली महाभारत में कही नहीं लिखा हुवा हे, और ये टीवी सीरियल्स की दें हे )

इस तरह द्रोणने द्रुपदसे बदला लिया | बादमे द्रुपदने अपने अपमान का बदला लेने के लिए पुत्र-कामेष्टी यज्ञ किया और इसके फलमे पुत्र धृष्टधुम्न को पाया जिसमे कुरुक्षेत्र युद्ध में द्रोणाचार्य का वध किया था |

वर्नाव्रात लाक्षागृह दहन

दुर्योधन अपने विरोधी पांडवो का हर हालमे नाश करना चाहता था | पांडव वर्नाव्रत गए थे, दुर्योधन ने अपने पुरोचन नामके वास्तुविशारद का साथ लिया और पांडवोके लिए वहा एक अतिभव्य महल बनवाया, लाख का महल ..!! पर महामंत्री विदुरने ये बाद पांडवो को बता दी, और उन्हें सावधान कर दिया | पांडवोने महलमें एक सुरंग बना दी, जहा से वे सुरक्षित निकल सके | एक दिन कुंतीने इस महल में ग्राम-भोजन का कार्यक्रम आयोजित किया | आजूबाजूके गाँवोंसे अनेको लोग भोजन के लिए आये इनमे एक निषाद महिला और उसके पांच पुत्र भी थे | कुंतीने उनसे रात्रि में वही रुकने की विनती की और उनके रात्रि के भोजनमें नशीली चीजे मिला दी | पांडवो की जगह निषादपुत्र और कुंती की जगह निषाद माता को सुलाने के बाद भीम ने महल को आग लगा दी | निषाद महिला, उसके पांच पुत्र और पुरोचन इस आग में जलकर नष्ट हो गए | सम्पूर्ण हस्तिनापुर महाराज धृतराष्ट सहित शोक में डूब गया पर महामंत्री विदुर को पता था, की जो मरे हे वो पांडव नहीं हे | विदुर के एक गुप्तचर ने उन्हें बताया था, पांडव एक नावमें गंगापार हो चुके हे |

हिडिम्ब का वध

गंगापार पांडव दक्षिण की और बढ़ते हे और एक बहोत घने जंगल में पुहच जाते हे | भीम सभी को एक पेड़ के निचे बिठाकर जल की तलाशमें निकल पड़ता हे | उन्होंने एक पेड़ पर चढ़कर एक जलाशय को ढूंड लिया और वे उस दिशा में बढे | जलाशय के समीप पोहचते हे उन्होंने अपनी प्यास बुझाई और जलक्रीडा कर अपने भाइयो के लिए पानी ले गये | उस जंगल में दो भाई-बहन राक्षस रहते थे, हिडिम्बा और हिडिम्ब | हिडिम्बा मनुष्यों का आभास पाकर उस दिशा में चल पड़ी, और जैसे ही उसने भीम को देखा तो वो उसपर मोहित हो गई | हिडिम्बा ने भीम से विवाह का प्रस्ताव रखा | तभी हिडिम्ब वहा आ गया और हिडिम्बाको भीम से बाते करते हुए देख क्रुद्ध हो उठा | वो उन्हें मारने के लिए दौड़ा, पर भीमने उसे बिचमेही पकड़ा और पटक दिया | भीम के पटकनेसे हिडिम्ब वही गतप्राण हो गया | माता कुंतीने भीम को हिडिम्बासे विवाह करने की अनुमति दी | वन में बिताये क्षणोंसे भीम और हिदम्बा को एक पुत्रप्राप्ति हुई, जिसका नाम था घटोत्कच..!

बकासुर वध

वनमें विहार करते हुए पांडवो की भेट महर्षि व्याससे हुयी | महर्षि व्यासने पांडवो को ब्रह्मचारियो का वेश धारण करके एकचक्र-नगर में रहने के लिए कहा | उन्ही की सलाहसे पांडव एकचक्र नगर में ब्राह्मणके घरमें रहने लगे | पांचो भाई ब्राह्मणवेश में हरदिन भिक्षा मांगकर लाते और उसीसे अपनी उपजीविका चलाते | एकदिन कुंतीने अपने आश्रयडाता ब्राह्मण की रोनेकी आवाज सुनी | पूछने पर पता चला की इस नगर के पास बक नमक एक असुर रहता हे | बक पहले सेकड़ो लोगो को मारकर खाता था, तब नगरवासियों ने उससे ये समझौता कर दिया की वे हर सप्ताह उसके पास गाडी भरकर मांस, पकवान, और एक आदमी भेज दिया करेंगे | ब्राह्मणने आगे बताया की अगले दिन उसीका जाने का क्रम हे | कुंतीने उसे सांत्वना दी और कहा अगले दिन मेरा पुत्र भीम चला जाएगा | दुसरे दिन भीम गाड़ी लेकर बकासुर के पास पुहचा | भीमने गाडी एक जगह लगाईं और वो खुद पकवानों का आनंद उठाने लगा | बकासुरने जब देखा की उसका खाना एक मांसपेशियों वाला आदमी खा रहा हे तो उसे गुस्सा आया | वो भीमसे भीड़ गया, भीमने उसे लात घूंसे मारकर जानसे मार दिया, और उसकी लाश को घसीटकर नगरमें ले आया |

द्रोपदी स्वयंवर

पांडव अभी एकचक्र नगरमेही थे की पांडवोने पांचालदेश की राजकुमारी के स्वयंवर के बारे में सुना | तभी महर्षि व्यास भी वहा पधारे | उनकी सलाहसे माता कुंती को लेकर पांडव पांचालकी तरह चल दिए | रास्ते में ऋषि धौम्यभी उनेसे आ मिले | राजधानीके निकट वे एक कुम्हारके घर में रुक गए | देशो-विदेशो के राजा-राजपुत्र स्वयंवर में भाग लेने के खातिर पांचाल आये थे | स्वयंवर का प्रण विशेष चर्चा का विषय बना हुवा था | सभाग्रह के बिच मध्य में आकाशमें एक गोलाकार घूमता हुवा चक्र था, उसके उपर एक मछली थी, जो भी कोई वीर मछली की परछाई को निचे पानी में देखकर उसकी आँख भेद दे, वही द्रोपदीसे विवाह कर सकता था |

Dropadi Swayamvar

स्वयंवर का दिनभी आ गया, अनेको राजाओंने प्रयास किये पर वे विफल रहे | महारथी कर्ण तब उठ खड़ा हुवा और निशाना साधने निकला | उसने अत्यंत कुशलतासे धनुष उठाया, और वो मछली की आंख को भेदने ही वाला था की, एक आवाज गूंजी “में, सूतपुत्र से विवाह नहीं करुँगी” | द्रोपदी ने कर्णसे विवाह करने से मना कर दिया था | अंतमें ब्राह्मणवेश धारी अर्जुन ने संधान कर मछली की आंख भेद दी | द्रोपदी और अर्जुन का विवाह संपन्न हुवा | तब राजाओ और पांडवो के बिच एक युद्ध हुवा | अर्जुन और कर्णमें भी युद्ध हुवा | पर अर्जुन के ब्राह्मणवेशमें होने के कारन कर्णने जीते हुए युद्ध को त्याग दिया|

जब पांडव घर पोहचे, तो अर्जुन ने कहा “देखो माँ, में क्या लाया हु ?” तब भीतरसे कुंतीने जवाब दिया, जोभी लाये हो आपस में बाँट लो | माता कुंतीने जब बाहर आकर देखा तो वो असमंजंस में पड़ी | युदिष्ठिर-अर्जुन ने कहा माँ तुम्हारा वचन मिथ्या साबित नही होगा | सभी पांडवो ने फिर द्रोपदी से शादी कर ली | द्रुपद अपनी पुत्री की इस अवहेलना से काफी दुखी हुए थे, तब महर्षी व्यासने उन्हें द्रोपदी की पूर्वजन्म की कथा सुनाई | उन्होंने बताया की पिचले जन्म में द्रोपदी को भगवन शिव से ये वरदान मिला हे की, उसका विवाह पांच पतियों से होगा और इसके बावजूद वो जिंदगीभर कुंवारी रहेगी |

खांडवप्रस्थ और पांडवो का इन्द्रप्रस्थ निर्माण

द्रोपदी और पांडवो के विवाह की खबर चारो दिशाओ में आग की तरह फेल गई | भीष्म, द्रोणाचार्य और धृतराष्ट ने पांडवो को वापस बुलाने का निर्णय लिया जिसका दुर्योधनने विरोध किया पर विदुर की शिष्टाई के कारन धृतराष्ट ने पांडवो को बुलाने का निर्णय लिया और उन्हें पांचाल भेजा | पुरे हस्तिनापुरने पांडवो का हर्ष और उल्हाससे स्वागत किया | धृतराष्टने उन्हें आधा राज्य दिया और सलाह दी की आपसी कलहसे बचने के लिए वे हस्तिनापुर छोड़कर जाए और खांडवप्रस्थमें कही अपनी राजधानी का निर्माण करे | धृतराष्ट की आज्ञा को मानकर युदिष्ठिर हस्तिनापुरसे खांडवप्रस्थ(खांडव वन का एक हिस्सा) की और निकल गए | खांडवप्रस्थ में एक अतीभव्य नगर का निर्माण हुवा, इन्द्रप्रस्थ का ! तेरह वर्षो तक युदिष्ठिरने इन्द्रप्रस्थसे राज्य किया |

अर्जुन का वनवास

एक दिन इन्द्रप्रस्थमें नारद मुनि आये और उन्होंने द्रोपदी को बताया की वो पांचो पांडवो के साथ रहने का कोई नियम बना ले, जैसे की वो हर एक के साथ कुछ विशेष समय व्यतीत करेगी, और जो भी इस नियम का उल्लंघन करेगा वो शिक्षा का पात्र होगा | द्रोपदीने ऐसा नियम बना लिया और तय हुवा की जो भी कोई इस नियम का उल्लंघन करेगा वो १२ वर्ष के वनवास का भागीदार होगा | एक दिन जब अर्जुन महल में बैठे थे | आजही द्रोपदी और अर्जुन के साथ का समय समाप्त हुवा था | तभी एक ब्राह्मण वहा आया और उसने कहा की चोर उसकी गाए चुरा ले गए हे | अर्जुन के अस्त्र द्रोपदी के कक्ष में थे | अर्जुन झटसे कक्षकी तरह भागे, पर कक्ष में द्रोपदी युदिष्ठिर के साथ थी | न जानते हुए अर्जुनसे नियम का भंग हुवा था | उन्होंने ब्राह्मण की गाये छुड़ाली | अर्जुन ने धर्मराजसे १२ वर्ष के वनवास की आज्ञा ली |

अर्जुन उलूपी विवाह

वनवास में अर्जुन हरिद्वार पुहाचे | गंगामें प्रातःस्नान करते हुए अर्जुन पर नागराज कैरव्य की पुत्री उलूपी मोहित हो गई और वो अर्जुन को अपने साथ पाताल-लोक ले गयी | उलूपी और अर्जुन ने पाताल में एकदूसरे से विवाह किया | उलूपी ने अपनी शक्तियोंसे अर्जुन को जल पर भी जमीन की तरह चलने की ताकद प्रदान करी |

चित्रांगदा और अर्जुन विवाह

जब अर्जुन नागलोकसे पृथ्वी पर लौटे तो उन्होंने तीर्थो का भ्रमण करना शुरू किया | ऐसेही भ्रमण करते हुए वे मणिपुर पुहचे | मणिपुर की राजकुमारी चित्रांगदा अत्यंत ही रूपसंपन्न थी | तिन वर्ष अर्जुन मणिपुर रहे और अर्जुनने चित्रांगदासे विवाह किया | चित्रांगदासे अर्जुन को बब्रुवाहन नामका एक महाशक्तिशाली पुत्र भी हुवा |

Babruvahana son of arjuna
babruvahana, who killed arjuna (Story comming soon)

सुभद्राहरण

मणिपुरसे अर्जुन प्रभास तीर्थ पुहचे, ये तीर्थ यादवो के राज्यमें ही था | भगवान कृष्णने अर्जुन का स्वागत किया | बलराम सुभद्रा का विवाह दुर्योधनसे करना चाहते थे | अर्जुनके मन में वहा रहते हुए सुभद्रा के लिए प्रेम निर्माण हुवा | भगवान कृष्णनेभी अर्जुन का साथ दिया | अर्जुन ने सुभद्रा का हरण कर लिया | यादवो ने अर्जुन का पीछा किया, और एक लड़ाई भी हुई पर अर्जुन सुभद्रा से विवाह करने में सफल हो गए | अर्जुन सुभद्रा के साथ काफी दिन पुष्कर में रहे और वनवास पूर्ण होने के बाद वे सुभद्रा के साथ इंद्रप्रस्थ लौटे | सुभद्रा और अर्जुन को एक पुत्र हुवा, अभिमन्यु |

खंडव दहन

एक दिन अग्निदेव ब्राह्मणवेश में अर्जुन के सामने आये | अग्निदेव को एक जर्जर रोग हुवा था, जो सिर्फ खांडववन के जिव जलानेसे दूर हो सकता था | पर खांडववन में इंद्र का दोस्त तक्षक भी रहता था, और जब भी अग्निदेव खांडववन जलाने जाते, इंद्र बारिशसे आग बुझा देते | अग्निदेव ने अर्जुनसे सहायता मांगी | तब अग्निदेवने अर्जुन को गांडीव धनुष और अक्षय तुणीर और साथ ही नाधिघोश नाम का एक दिव्य रथ दिया | खांडव-वन एक बहोत ही घना जंगल था | अर्जुनने अपनी धनुर्विद्या से खांडव वन में आग लगा दी और लाखो मिल फैला खांडववन जलकर रख हुवा, जिसमे हजारो-लाखो वन्य जिव और आदिवासी मारे गए | इंद्र जब खांडववन की रक्षा करने आये तो उनका अर्जुनसे युद्ध हुवा | इंद्र अपने पुत्र की वीरता देख प्रसन्न हुए | खांडव वनसे कुछ गिनेचुने लोग बचे थे, जिनमे एक मयासुर नामका दानव भी था | इसी दानव ने इन्द्रप्रस्थ का निर्माण किया, जिसमे बनाई गयी मयसभा एक महान निर्मिती थी |

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